मध्यप्रदेश

एमपी में OBC आरक्षण 14% पर कायम, 27% की मांग खारिज, 7 साल में 92 सुनवाइयों के बाद हाई कोर्ट का फैसला; 13% होल्ड पदों पर अब सबकी नजर, हजारों अभ्यर्थियों के भविष्य को लेकर बढ़ी उत्सुकता

जनलोक टाईम्स से रामेश्वर त्रिपाठी की रिपोर्ट

जबलपुर- मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के आरक्षण को लेकर करीब सात साल से चल रही कानूनी लड़ाई पर शुक्रवार को महत्वपूर्ण फैसला आया। जबलपुर हाई कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की मांग खारिज कर दी। अदालत ने  ओबीसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व होने की बात कही। इस फैसले के बाद अब उन 13 प्रतिशत पदों को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं, जिन्हें विवाद के चलते वर्षों से होल्ड पर रखा गया था। इन पदों के भविष्य और नियुक्तियों की अगली प्रक्रिया पर हजारों अभ्यर्थियों की नजर टिकी है।

2019 में बढ़ाया गया था आरक्षण

ओबीसी आरक्षण विवाद की शुरुआत मार्च 2019 में हुई थी। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था। सरकार का तर्क था कि मध्य प्रदेश की आबादी में ओबीसी वर्ग की हिस्सेदारी करीब 51 प्रतिशत है। हालांकि, इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई और मामला लंबी कानूनी प्रक्रिया में उलझ गया।

19 मार्च 2019 को पीएससी की मेडिकल भर्ती से जुड़े आशिता दुबे प्रकरण में पहली याचिका दायर हुई। इसके बाद आरक्षण बढ़ाने के फैसले के खिलाफ कई अन्य याचिकाएं भी दाखिल हुईं। हाई कोर्ट के अंतरिम आदेशों के चलते 27 प्रतिशत आरक्षण को पूरी तरह लागू नहीं किया जा सका और विभिन्न भर्तियों में नियुक्तियों की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

2022 में आया 87:13 का फॉर्मूला

भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और कानूनी विवाद के बीच रास्ता निकालने के लिए राज्य सरकार ने सितंबर 2022 में 87:13 का फॉर्मूला अपनाया। इसके तहत 87 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियों की प्रक्रिया आगे बढ़ाने और शेष 13 प्रतिशत पदों को अंतिम न्यायिक निर्णय आने तक होल्ड पर रखने की व्यवस्था की गई।

इन 13 प्रतिशत पदों का संबंध ओबीसी आरक्षण को 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के अतिरिक्त हिस्से से था। यानी दोनों आरक्षण प्रतिशत के बीच का अंतर 13 प्रतिशत अंक है। इस व्यवस्था का उद्देश्य विवाद के अंतिम निपटारे तक नियुक्तियों की प्रक्रिया को पूरी तरह ठप होने से बचाना था।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट की थी सरकार की व्यवस्था

मार्च 2024 में हाई कोर्ट की युगलपीठ ने स्पष्ट किया था कि 87:13 का फॉर्मूला अदालत द्वारा निर्धारित व्यवस्था नहीं, बल्कि राज्य सरकार की अपनी व्यवस्था है। अब आरक्षण विवाद पर आए फैसले के बाद लंबित पदों के संबंध में आगे की कार्रवाई को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

13 प्रतिशत पदों पर क्या होगा?

आरक्षण को 14 प्रतिशत पर कायम रखने के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से होल्ड पर रखे गए 13 प्रतिशत पदों का आवंटन किस आधार पर होगा। इन पदों को अनारक्षित श्रेणी में देने की चर्चा है, लेकिन इस संबंध में अंतिम निर्णय और आधिकारिक आदेश का इंतजार करना होगा।

फिलहाल, फैसले से उन अभ्यर्थियों की उम्मीदें और चिंताएं दोनों जुड़ी हैं, जिनकी नियुक्तियां इन लंबित पदों के कारण प्रभावित हुई हैं। अब सरकार और संबंधित भर्ती एजेंसियों के अगले कदम पर नजर रहेगी।

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