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‘प्रमाण दो या फिर रावण दहन बंद करो’ उज्जैन महाकाल मंदिर के पुजारी का 4 संस्थाओं को नोटिस

जनलोक टाईम्स से रामेश्वर त्रिपाठी की रिपोर्ट

उज्जैन- धर्मनगरी उज्जैन में दशहरे से पहले रावण दहन की सदियों पुरानी परंपरा को लेकर नई बहस छिड़ गई है। महाकाल मंदिर से जुड़े महेश पुजारी ने रावण के पुतले का दहन करने की परंपरा पर सवाल उठाते हुए इसे शास्त्रीय आधार पर साबित करने की चुनौती दी है। उनके इस कदम से धार्मिक परंपराओं, शास्त्रीय मान्यताओं और लोकाचार के बीच बहस तेज होने की संभावना है।

महेश पुजारी का तर्क है कि वाल्मीकि रामायण और रामचरितमानस में भगवान श्रीराम द्वारा रावण वध का वर्णन मिलता है, लेकिन रावण का पुतला बनाकर उसे जलाने की परंपरा का स्पष्ट शास्त्रीय उल्लेख नहीं मिलता। इसी आधार पर उन्होंने इस प्रथा की धार्मिक प्रामाणिकता पर सवाल खड़े किए हैं।

चार संस्थाओं को नोटिस, शास्त्रार्थ की चुनौती

जानकारी के अनुसार, महेश पुजारी ने उज्जैन में रावण दहन का आयोजन करने वाली चार प्रमुख संस्थाओं को नोटिस भेजकर शास्त्रार्थ की खुली चुनौती दी है। साथ ही उन्होंने रावण दहन की प्रथा को बंद करने की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि यदि इस परंपरा का कोई शास्त्रीय आधार है, तो उसे धार्मिक ग्रंथों और प्रमाणों के माध्यम से स्पष्ट किया जाना चाहिए।

शास्त्र बनाम लोक परंपरा की बहस

इस मुद्दे ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या धार्मिक आयोजनों और परंपराओं का आधार केवल शास्त्रों में वर्णित विधियां होनी चाहिए, या फिर सदियों से समाज में प्रचलित लोक-मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं का भी अपना महत्व है?

दशहरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है और रावण दहन देश के अनेक हिस्सों में इस पर्व का प्रमुख आकर्षण रहता है। ऐसे में उज्जैन में उठी यह आपत्ति धार्मिक परंपराओं की व्याख्या और उनके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व को लेकर नई चर्चा का विषय बन गई है।

फिलहाल, इस मामले में संबंधित संस्थाओं के जवाब और आगे की प्रतिक्रिया पर नजर रहेगी। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शास्त्रार्थ की चुनौती के बाद यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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