भोपाल- मध्यप्रदेश में स्वामित्व योजना के तहत करीब 50 लाख ग्रामीण आवासीय भूखंडों की नि:शुल्क रजिस्ट्री को लेकर सरकार और पटवारियों के बीच विवाद गहरा गया है। 17 सितंबर से शुरू हुए अभियान में पटवारी रजिस्ट्री प्रक्रिया में विक्रेता बनने पर आपत्ति जता रहे हैं। सरकार की ओर से अभियान को तय समयसीमा में पूरा करने पर जोर है, जबकि पटवारी संघ ने स्पष्ट किया है कि दबाव में कार्रवाई या बर्खास्तगी हुई तो वे सामान्य राजस्व कार्य भी बंद कर सकते हैं।
बर्खास्तगी पर काम बंद करने की चेतावनी
पटवारी संघ का कहना है कि स्वामित्व योजना में पटवारियों को विक्रेता की भूमिका देना उन्हें भविष्य के विवादों और न्यायालयीन मामलों में फंसा सकता है। संघ के प्रांताध्यक्ष उपेंद्र सिंह बघेल के मुताबिक संघ ने स्वामित्व योजना से जुड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कार्यों से अलग रहने का निर्णय लिया है। रजिस्ट्री का काम भी नहीं किया जाएगा।
विवाद की जड़ क्या है?
अभियान के तहत करीब 68 लाख भूखंडों के अधिकार अभिलेख तैयार किए जा चुके हैं, जिनमें से लगभग 50 लाख निजी संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री कराने का लक्ष्य रखा गया है। रजिस्ट्री प्रक्रिया को तेजी से पूरा करने के लिए पंचायत स्तर पर शिविर लगाए जा रहे हैं और तहसीलदार, नायब तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक सहित अन्य अधिकारियों को पंजीयन संबंधी जिम्मेदारियां दी गई हैं।
पटवारियों की आपत्ति मुख्य रूप से विक्रेता के रूप में उनकी भूमिका को लेकर है। उनका तर्क है कि जमीन से जुड़े पारिवारिक अथवा स्वामित्व विवाद सामने आने पर संबंधित पक्ष पटवारी को भी मामले में पक्षकार बना सकता है। 50 लाख प्रकरणों में ऐसे विवादों की आशंका को लेकर संघ अपनी जिम्मेदारी तय करने की मांग कर रहा है।
सरकार का तर्क- रजिस्ट्री से बढ़ेगी कर्ज की सुविधा
सरकार का कहना है कि नि:शुल्क रजिस्ट्री से ग्रामीण हितग्राहियों को अपनी संपत्ति का पंजीकृत दस्तावेज मिलेगा और बैंक ऋण सहित अन्य आर्थिक सुविधाओं तक पहुंच आसान हो सकेगी। योजना के तहत पहले से तैयार अधिकार अभिलेखों के आधार पर यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।
विशेषज्ञों ने उठाया अभियान की उपयोगिता पर सवाल
जमीनी मामलों के जानकार एवं पूर्व अधिकारी ओपी भट्ट ने रजिस्ट्री की अनिवार्यता पर सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि स्वामित्व योजना के तहत हितग्राहियों को नक्शा, खसरा, खतौनी और बही जैसे दस्तावेज पहले ही उपलब्ध कराए जा चुके हैं। ऐसे में यदि बैंक ऋण के लिए रजिस्ट्री की प्रति मांग रहे हैं तो शासन को बैंकों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए थे।
विशेषज्ञों ने यह भी सवाल उठाया है कि नि:शुल्क रजिस्ट्री के कारण शासन को मिलने वाले संभावित राजस्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा और अभियान की रूपरेखा तय करने से पहले जमीनी स्तर की आपत्तियों का पर्याप्त समाधान क्यों नहीं किया गया।
पायलट प्रोजेक्ट में भी सामने आई थीं आपत्तियां
अभियान को प्रदेशभर में लागू करने से पहले आगर-मालवा, हरदा, बड़वानी, अशोकनगर और रायसेन में पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था। इसी दौरान पटवारियों की आपत्तियां सामने आने की बात कही गई। इसके बावजूद प्रदेशव्यापी अभियान शुरू कर दिया गया।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
एक ओर सरकार 50 लाख नि:शुल्क रजिस्ट्रियों का लक्ष्य समयसीमा में पूरा करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर पटवारियों के विरोध ने अभियान के क्रियान्वयन को चुनौती दे दी है। अब विवाद का केंद्र पटवारियों की जिम्मेदारी, संभावित न्यायालयीन जवाबदेही और रजिस्ट्री की वास्तविक उपयोगिता बन गया है।