ढीमरखेड़ा- सरकारें भले ही ग्रामीण अंचलों में ‘सड़क कनेक्टिविटी’ और ‘डिजिटल इंडिया’ के बड़े-बड़े दावे करती थकती न हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों को पूरी तरह से खोखला साबित कर रही है।ढीमरखेड़ा विकासखंड के अंतर्गत पोड़ी से खिरवा को जोड़ने वाली सड़क इन दिनों विकास की नहीं, बल्कि बदइंतजामी और प्रशासनिक उदासीनता की एक ऐसी डरावनी तस्वीर पेश कर रही है, जिसे देखकर व्यवस्था से भरोसा उठ जाए। लोक निर्माण विभाग के अधीन आने वाली यह सड़क पिछले कई वर्षों से उपेक्षा का शिकार है। महज डेढ़ किलोमीटर लंबा यह मार्ग आज ग्रामीणों के लिए परेशानी, मानसिक पीड़ा और जानलेवा जोखिम का पर्याय बन चुका है।बरसात का मौसम शुरू होते ही यह पूरी सड़क एक गहरे कीचड़ के दलदल में तब्दील हो जाती है, जबकि गर्मियों के दिनों में धूल के गुबार और जानलेवा गड्ढे राहगीरों का दम घोटते हैं। पक्की सड़क के अभाव में आज इस मार्ग से गुजरना किसी खतरनाक जंग को जीतने से कम नहीं रह गया है।
कई गांवों की लाइफलाइन, फिर भी उपेक्षित
यह डेढ़ किलोमीटर का टुकड़ा केवल पोड़ी और खिरवा गांवों को आपस में जोड़ने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आसपास के अनेकों छोटे-बड़े गांवों के लिए एक मुख्य संपर्क मार्ग है। इसी रास्ते के भरोसे स्कूली बच्चे अपने भविष्य को संवारने के लिए शिक्षा की ओर कदम बढ़ाते हैं। अन्नदाता किसान खून-पसीना बहाकर उपजाई फसल को कृषि उपज मंडी तक पहुंचाते हैं। दिहाड़ी मजदूर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए रोज़गार की तलाश में शहरों की ओर निकलते हैं।गंभीर मरीज और गर्भवती महिलाएं इलाज के लिए शासकीय या निजी अस्पतालों तक का सफर तय करती हैं।इतनी महत्वपूर्ण सड़क होने के बावजूद लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के कुंभकर्णी नींद में सोए अधिकारी इस ओर ध्यान देने को तैयार नहीं हैं।विभाग की इस लगातार अनदेखी और संवेदनहीनता के कारण अब संपूर्ण ग्रामीण क्षेत्र में भारी आक्रोश पनप रहा है।
बरसात चालू होते ही भयावह हुए हालात हर कदम पर हादसों का डर
वर्तमान में हो रही मानसूनी बारिश ने इस सड़क के बचे-खुचे अस्तित्व को भी पूरी तरह समाप्त कर दिया है। पूरी कच्ची सड़क पर जगह-जगह दो से तीन फीट गहरे गड्ढे बन चुके हैं। इन गड्ढों में लगातार बारिश का पानी और कीचड़ जमा होने के कारण राहगीरों के लिए रास्ते का अंदाजा लगाना पूरी तरह से नामुमकिन हो जाता है। वाहन चालकों को यह समझ ही नहीं आता कि वे अपनी गाड़ी सड़क पर चला रहे हैं या किसी कीचड़ के कुएं में डाल रहे हैं। दोपहिया वाहनों का फिसलकर अनियंत्रित होना और चालकों का चोटिल होना यहाँ की रोज़मर्रा की कहानी बन चुका है। साइकिल सवार, पैदल चलने वाले ग्रामीण और मासूम स्कूली बच्चे इस दलदल में पैर फिसलने के कारण गंभीर रूप से घायल हो रहे हैं। बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए तो इस मार्ग पर कदम रखना भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।
नौनिहालों का भविष्य दांव पर डर के साये में स्कूल जाने को मजबूर बच्चे
इस प्रशासनिक लापरवाही की सबसे बड़ी कीमत देश का भविष्य यानी स्कूली बच्चे चुका रहे हैं। ग्रामीण अभिभावकों ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि उनके बच्चे रोज़ सुबह स्कूल जाने के नाम से ही डर जाते हैं। बारिश के दिनों में बच्चे किसी तरह गिरते-पड़ते, कीचड़ से सने कपड़ों, गंदे जूतों और भीगे हुए बस्तों के साथ स्कूल पहुँचते हैं। कई बार स्थिति इतनी बदतर हो जाती है कि अभिभावक हादसों के डर से बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर देते हैं। शिक्षा जैसी बुनियादी और संवैधानिक आवश्यकता तक पहुंचने के रास्ते में इस तरह का अवरोध, शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और ‘पढ़ेगा इंडिया, तो बढ़ेगा इंडिया’ के नारों पर एक बड़ा तमाचा है।
स्वास्थ्य सेवाएं भी वेंटिलेटर पर एम्बुलेंस आने से कतराती है
सड़क की दुर्दशा का सबसे खौफनाक पहलू स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि गांव में अचानक कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी महिला को प्रसव पीड़ा हो, तो ‘जननी एक्सप्रेस’ या ‘108 एम्बुलेंस’ इस डेढ़ किलोमीटर के कीचड़ को देखकर गांव के बाहर ही रुक जाती है। ऐसी स्थिति में मरीजों को खाट (चारपाई) पर लिटाकर या कस्टमाइज्ड जुगाड़ गाड़ियों के सहारे मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता है। समय पर इलाज न मिलने के कारण कई बार मरीजों की जान पर बन आती है।
ग्रामीणों की चेतावनी सड़क नहीं तो वोट नहीं
स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है।पीडब्ल्यूडी के रवैये से त्रस्त होकर ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।ग्रामीणों का कहना है कि वे कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर पीडब्ल्यूडी के आला अधिकारियों और जिला प्रशासन को लिखित और मौखिक रूप से शिकायतें दे चुके हैं। हर बार उन्हें केवल ‘आश्वासन का झुनझुना’ थमा दिया जाता है, लेकिन धरातल पर काम के नाम पर एक गिट्ट अधिकारियों का वही ढर्रा प्रस्ताव भेजा गया है।