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धान की फसल पर कृषि विभाग की पैनी नजर, गांव-गांव पहुंच रहे अधिकारी, ‘भूरा माहू’ के प्रकोप की रोकथाम के लिए किसानों को दे रहे तकनीकी सलाह

जनलोक टाईम्स से रामेश्वर त्रिपाठी की रिपोर्ट

कटनी- जिले में धान की फसल को कीट एवं व्याधियों से बचाने के लिए कृषि विभाग ने मैदानी निगरानी तेज कर दी है। कुछ क्षेत्रों में धान की फसल में कीट व्याधि के प्रभाव को देखते हुए कलेक्टर श्री आशीष तिवारी ने कृषि अधिकारियों एवं मैदानी अमले को गांव-गांव पहुंचकर फसलों का सतत निरीक्षण करने और किसानों को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रण के उपाय बताने के निर्देश दिए हैं।

कलेक्टर के निर्देश पर कृषि विस्तार अधिकारी लगातार किसानों के खेतों का भ्रमण कर फसल की स्थिति का जायजा ले रहे हैं। अधिकारियों द्वारा भूरा माहू सहित अन्य संभावित कीटों के प्रकोप की निगरानी करते हुए किसानों को समय पर आवश्यक नियंत्रण उपाय अपनाने की सलाह दी जा रही है।

‘भूरा माहू’ से बचाव के लिए खेत रखें सूखा

कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि भूरा माहू के नियंत्रण के लिए खेत में समुचित जल निकासी की व्यवस्था कर दो-तीन दिन खेत को सूखा रखें। नाइट्रोजनयुक्त उर्वरक एवं यूरिया का अत्यधिक उपयोग न करते हुए संतुलित उर्वरकों का प्रयोग करें। खेत की मेड़ों को घास एवं खरपतवार से मुक्त रखना भी जरूरी बताया गया है।

प्रकोप होने पर अनुशंसित कीटनाशक का ही करें इस्तेमाल

विभाग ने स्पष्ट किया है कि कीट का प्रकोप दिखाई देने पर एक समय में किसी एक अनुशंसित रसायन का ही उपयोग किया जाए। कृषि विभाग द्वारा पायमेट्रोजिन, डायनोटेफ्यूरोन, थायोमेथेक्जाम, इमीडाक्लोप्रिड सहित अन्य अनुशंसित कीटनाशकों की मात्रा और उपयोग की तकनीकी जानकारी किसानों को दी जा रही है।

दवा के छिड़काव के लिए 500 लीटर पानी प्रति हेक्टेयर की मात्रा रखने तथा पौधों को दवा के घोल से अच्छी तरह गीला करने की सलाह दी गई है। दवा के प्रभाव को बेहतर बनाने के लिए सिलिकॉन अथवा चिपको स्प्रेडर के उपयोग की जानकारी भी किसानों को दी जा रही है।

लक्षण दिखते ही कृषि अमले से करें संपर्क

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि धान की फसल में किसी भी प्रकार के कीट या व्याधि के लक्षण दिखाई देने पर स्वयं मनमाने तरीके से कीटनाशक का प्रयोग न करें। तत्काल कृषि विस्तार अधिकारी से संपर्क कर विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही दवा का उपयोग करें। विभाग का कहना है कि समय पर पहचान, नियमित निगरानी और वैज्ञानिक नियंत्रण उपायों से धान की फसल को संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है।

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