नई दिल्ली- 2000 से अधिक के चुनिंदा UPI पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार, RBI, NPCI और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को तकनीकी प्रकृति का बताते हुए केंद्र और अन्य पक्षों को चार सप्ताह के भीतर काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का निर्देश दिया है। नई व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होनी है। इसके तहत सामान्य श्रेणी के चुनिंदा P2M UPI लेन-देन में ₹2,000 से अधिक की राशि पर 0.4 प्रतिशत MDR निर्धारित किया गया है। यह शुल्क प्रति लेन-देन अधिकतम ₹300 तक सीमित रहेगा।
96 फीसदी व्यापारी लेन-देन पर असर नहीं
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नई व्यवस्था का प्रभाव सीमित है। वित्त मंत्रालय के अनुसार, सभी P2P यानी व्यक्ति से व्यक्ति के UPI भुगतान पूरी तरह मुफ्त रहेंगे, चाहे भुगतान की राशि कितनी भी हो। वहीं ₹2,000 तक के मर्चेंट भुगतान और छोटे व्यापारियों के लिए जीरो-MDR व्यवस्था के दायरे में आने वाले लेन-देन भी मुफ्त रहेंगे। सरकार का दावा है कि करीब 96 प्रतिशत P2M लेन-देन प्रभावित नहीं होंगे।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि MDR ग्राहकों से वसूला जाने वाला शुल्क नहीं, बल्कि मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम में लगाया जाने वाला चार्ज है। बैंकों को निर्देश दिया गया है कि इसका बोझ ग्राहकों पर न डाला जाए। साथ ही UPI ऐप प्रदाताओं को प्लेटफॉर्म फीस या छिपे हुए शुल्क लगाने से मना किया गया है।
क्या बदला है: 15 अक्टूबर से चुनिंदा ₹2,000 से अधिक P2M भुगतान पर MDR लागू होगा, जबकि सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति UPI भुगतान पहले की तरह निःशुल्क रहेगा। सुप्रीम कोर्ट में इस व्यवस्था की कानूनी वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।