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मनरेगा से जी-राम-जी तक: नाम बदला, लेकिन मजदूर की तकदीर नहीं !

जनलोक टाईम्स से रामेश्वर त्रिपाठी की रिपोर्ट

भोपाल- देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। योजना के नाम और स्वरूप को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं भले ही गर्म हों, लेकिन गांवों में रहने वाले लाखों मजदूरों की जिंदगी में आज भी बहुत कुछ वैसा ही है जैसा वर्षों पहले था। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में यह सवाल लगातार उठ रहा है कि “नाम बदलने से क्या मजदूर की तकदीर बदलेगी?”

ग्रामीण भारत में मनरेगा ने बीते वर्षों में रोजगार का एक महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है। सूखा, बेरोजगारी और आर्थिक संकट के दौर में यह योजना लाखों परिवारों के लिए सहारा बनी है। हालांकि, जमीनी स्तर पर मजदूरों की समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। कई क्षेत्रों में समय पर मजदूरी का भुगतान नहीं होना, कार्यों की सीमित उपलब्धता, तकनीकी प्रक्रियाओं की जटिलता और प्रशासनिक उदासीनता जैसी चुनौतियां लगातार सामने आती रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी योजना की सफलता उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। ग्रामीण मजदूरों का कहना है कि उन्हें इस बात से अधिक सरोकार नहीं है कि योजना का नाम क्या है, बल्कि उनकी प्राथमिकता समय पर काम, उचित मजदूरी और सम्मानजनक जीवन है।

मध्यप्रदेश सहित देश के कई राज्यों में मनरेगा के तहत जल संरक्षण, सड़क निर्माण, तालाब गहरीकरण और ग्रामीण अधोसंरचना विकास के अनेक कार्य हुए हैं, लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद मजदूरों की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बड़ी संख्या में परिवार रोजगार और आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में ग्रामीण श्रमिकों के जीवन में बदलाव लाना चाहती है, तो उसे योजनाओं के नामकरण की बजाय मजदूरी भुगतान की समयबद्ध व्यवस्था, रोजगार के दिनों में वृद्धि, पारदर्शिता और जवाबदेही पर अधिक ध्यान देना होगा।

ग्रामीण भारत का यह सवाल आज भी प्रासंगिक है कि क्या केवल नाम बदल देने से व्यवस्था बदल जाती है, या फिर वास्तविक परिवर्तन के लिए नीतियों को जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू करना आवश्यक है? जवाब शायद गांव के उस मजदूर के पास है, जो आज भी अपने परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीद में रोज काम की तलाश में निकलता है।

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